Monday, 31 October 2011

सत्‍य का वजूद

बहुत बेबस हो जाता हूं मैं,
जब देखता हूं अपनी खुली आंखों से,
सत्‍य को मरते हुए,
कुचलते हुए।
कराहते हुए सत्‍य की टीस,
धंस जाती है सीने में।
जानता हूं कि सत्‍य,
कभी मरता नहीं,
अपने वजूद की भीख नहीं मांगता।
फिर भी विकलांग सत्‍य को,
लडखडाते हुए देखना,
और भी मायूस करता है मुझे।
जानता हूं कि सत्‍य की चोट,
बडी ही गहरी होती है।
फिर भी....।
सपने को सत्‍य में तब्‍दील होते,
देखना चाहता हूं।
जानता हूं कि सत्‍य खतरनाक,
होता है....।
फिर भी...
असत्‍य को सत्‍य में तब्‍दील होते देखना,
अपने सपनों को मरते हुए देखने जैसा ही है...।
बहुत बेबस हो जाता हूं,
जब सत्‍य की पहचान करना,
मुश्‍क‍िल हो जाता है।
खैर मैंने भी अब,
सत्‍य को कमरे की खूंटी पर,
टांग दिया है...।
असत्‍य का तमगा माथे पर,
बांध लिया है।
जानता हूं कि सत्‍य की चोट,
गहरी होती है,
पर सपनों को जिंदा रखने की तरकीब,
ढूढ ही लिया है।
अब मुझे सत्‍य के चीखने, चिल्‍लाने पर,
अफसोस नहीं होता.,
बस कराहते सत्‍य को,
अनुसना करके आगे बढ जाता हूं।
रात को चादर ओढकर,
चुपचाप सो जाता हूं...।
जानता  हूं कि अब हर सत्‍य,
मेरे लिए एक मामूली घटना,
बनकर रह जाती है।
हाशिए पर खडी एक खबर,
बनकर रह जाती है....।
बस  कभी कभार,
एक टीस बनकर
सत्‍य मुझे कुरेदता है....,।
शायद मेरे वजूद के ,
कहीं जिंदा होने की,
यह सत्‍य की आहट तो नहीं.......।

शायद हम जिंदा हैं...

मैं देखता हूं रोज,
एक खबर को,
जो चबाती है इंसानी दिमाग को
बडे निर्मम और निष्‍ठुर तरीके से,
हर तरफ एक वेश्‍या की तरह,
अपने बिकने के इंतजार में,
सजी संवरी सी नजर आती है खबर,
हमेशा अपना रंग बदलने को तैयार,
बेचैन सी रहती है खबर।
हर तरफ एक आहट,
एक सुगबुगाहट,
कुछ बुदबुदाहट को,
सूंघती रहती है खबर।
इंसान को जिंदा लाश बनने को,
मजबूर करती है खबर।
हम अकसर गलतफहमी में जीते हैं,
हम जिंदा हैं.....
......और मरती रहती है खबर।

Sunday, 30 October 2011

मौसम

एक नहीं कई बार,
जब भी मैंने चाहा
दुनिया बदलने की,
हर बार खुद को ही--
बदला हुआ पाया।
आजाद होना चाहा...
और भी जकडा हुआ पाया।
जिंदगी हर बार...
मेरे जेहन से,
उतरती जाती है...
मैं हर बार रेत में खडा...
बारिश का इंतजार करता हूं...
कंबख्‍त धूप..
है कि मेरे कंधों पर बैठी हुई...
इंतजार करती है सांझ ढलने का...
उससे पहले ही रात आ जाती है...
अकसर अमावस की...
न जाने कितनी लंबी...
बरसों बाद...
अब इन खिडकियों से
 धूप नहीं आती...
बारिश बाहर से ही चली जाती है
दरवाजों पर दस्‍तक देकर...
...मगर मुझे इंतजार है आज भी
मौसम के बदलने का....।