Monday, 31 October 2011

शायद हम जिंदा हैं...

मैं देखता हूं रोज,
एक खबर को,
जो चबाती है इंसानी दिमाग को
बडे निर्मम और निष्‍ठुर तरीके से,
हर तरफ एक वेश्‍या की तरह,
अपने बिकने के इंतजार में,
सजी संवरी सी नजर आती है खबर,
हमेशा अपना रंग बदलने को तैयार,
बेचैन सी रहती है खबर।
हर तरफ एक आहट,
एक सुगबुगाहट,
कुछ बुदबुदाहट को,
सूंघती रहती है खबर।
इंसान को जिंदा लाश बनने को,
मजबूर करती है खबर।
हम अकसर गलतफहमी में जीते हैं,
हम जिंदा हैं.....
......और मरती रहती है खबर।

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