बहुत बेबस हो जाता हूं मैं,
जब देखता हूं अपनी खुली आंखों से,
सत्य को मरते हुए,
कुचलते हुए।
कराहते हुए सत्य की टीस,
धंस जाती है सीने में।
जानता हूं कि सत्य,
कभी मरता नहीं,
अपने वजूद की भीख नहीं मांगता।
फिर भी विकलांग सत्य को,
लडखडाते हुए देखना,
और भी मायूस करता है मुझे।
जानता हूं कि सत्य की चोट,
बडी ही गहरी होती है।
फिर भी....।
सपने को सत्य में तब्दील होते,
देखना चाहता हूं।
जानता हूं कि सत्य खतरनाक,
होता है....।
फिर भी...
असत्य को सत्य में तब्दील होते देखना,
अपने सपनों को मरते हुए देखने जैसा ही है...।
बहुत बेबस हो जाता हूं,
जब सत्य की पहचान करना,
मुश्किल हो जाता है।
खैर मैंने भी अब,
सत्य को कमरे की खूंटी पर,
टांग दिया है...।
असत्य का तमगा माथे पर,
बांध लिया है।
जानता हूं कि सत्य की चोट,
गहरी होती है,
पर सपनों को जिंदा रखने की तरकीब,
ढूढ ही लिया है।
अब मुझे सत्य के चीखने, चिल्लाने पर,
अफसोस नहीं होता.,
बस कराहते सत्य को,
अनुसना करके आगे बढ जाता हूं।
रात को चादर ओढकर,
चुपचाप सो जाता हूं...।
जानता हूं कि अब हर सत्य,
मेरे लिए एक मामूली घटना,
बनकर रह जाती है।
हाशिए पर खडी एक खबर,
बनकर रह जाती है....।
बस कभी कभार,
एक टीस बनकर
सत्य मुझे कुरेदता है....,।
शायद मेरे वजूद के ,
कहीं जिंदा होने की,
यह सत्य की आहट तो नहीं.......।
जब देखता हूं अपनी खुली आंखों से,
सत्य को मरते हुए,
कुचलते हुए।
कराहते हुए सत्य की टीस,
धंस जाती है सीने में।
जानता हूं कि सत्य,
कभी मरता नहीं,
अपने वजूद की भीख नहीं मांगता।
फिर भी विकलांग सत्य को,
लडखडाते हुए देखना,
और भी मायूस करता है मुझे।
जानता हूं कि सत्य की चोट,
बडी ही गहरी होती है।
फिर भी....।
सपने को सत्य में तब्दील होते,
देखना चाहता हूं।
जानता हूं कि सत्य खतरनाक,
होता है....।
फिर भी...
असत्य को सत्य में तब्दील होते देखना,
अपने सपनों को मरते हुए देखने जैसा ही है...।
बहुत बेबस हो जाता हूं,
जब सत्य की पहचान करना,
मुश्किल हो जाता है।
खैर मैंने भी अब,
सत्य को कमरे की खूंटी पर,
टांग दिया है...।
असत्य का तमगा माथे पर,
बांध लिया है।
जानता हूं कि सत्य की चोट,
गहरी होती है,
पर सपनों को जिंदा रखने की तरकीब,
ढूढ ही लिया है।
अब मुझे सत्य के चीखने, चिल्लाने पर,
अफसोस नहीं होता.,
बस कराहते सत्य को,
अनुसना करके आगे बढ जाता हूं।
रात को चादर ओढकर,
चुपचाप सो जाता हूं...।
जानता हूं कि अब हर सत्य,
मेरे लिए एक मामूली घटना,
बनकर रह जाती है।
हाशिए पर खडी एक खबर,
बनकर रह जाती है....।
बस कभी कभार,
एक टीस बनकर
सत्य मुझे कुरेदता है....,।
शायद मेरे वजूद के ,
कहीं जिंदा होने की,
यह सत्य की आहट तो नहीं.......।
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