Sunday, 30 October 2011

मौसम

एक नहीं कई बार,
जब भी मैंने चाहा
दुनिया बदलने की,
हर बार खुद को ही--
बदला हुआ पाया।
आजाद होना चाहा...
और भी जकडा हुआ पाया।
जिंदगी हर बार...
मेरे जेहन से,
उतरती जाती है...
मैं हर बार रेत में खडा...
बारिश का इंतजार करता हूं...
कंबख्‍त धूप..
है कि मेरे कंधों पर बैठी हुई...
इंतजार करती है सांझ ढलने का...
उससे पहले ही रात आ जाती है...
अकसर अमावस की...
न जाने कितनी लंबी...
बरसों बाद...
अब इन खिडकियों से
 धूप नहीं आती...
बारिश बाहर से ही चली जाती है
दरवाजों पर दस्‍तक देकर...
...मगर मुझे इंतजार है आज भी
मौसम के बदलने का....।

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