Thursday, 3 November 2011

सांझ का सूरज

जब भी मैं सांझ का सूरज देखता हूं,
मुझे अकसर अपने गांव वाले घर,
आंगन से उठते हुए चूल्‍हे का धुआं,
याद आता है।
जब भी मैं सांझ के सूरज को देखता हूं,
अकसर मुझे खेतों में पकी हुई
सुनहली बालियां याद आती हैं गेहूं की।
जब भी देखता हूं सांझ के सूरज को,
अकसर मुझे अपने घरौंदों में लौटते
पंक्षियों की चहचहाने और
बच्‍चों की किलकारियों की याद गूंज जाती है।
जब भी मैं सांझ के सूरज को देखता हूं,
अकसर मेरी आंखों के आगे तैर जाते हैं,
दादा-दादी, नानी-नाना, अम्‍मा-बाबूजी और न जाने कितने रिश्‍ते....।
आज जब कि मैं हूं
शहरों में फैले कंकरीटों के जंगल में,
सूरज नहीं दिखायी देता यहां,
न ही याद आते हैं मुझे वो रिश्‍ते।
इन पत्‍थरों की तरह हो चुका हूं,
मैं भी एक बेजान पत्‍थर।
जब भी कभी निकलना चाहा,
इन पत्‍थरों के झुरमुटों से,
और भी जकड लेती हैं मुझे ये उंची इमारतें।
फ‍िर भी मैं अकसर इनसे आजाद होकर,
पहुंच ही जाता हूं फ़लैट के छत पर।
सांझ के सूरज को देखने, बाहें पसारे,
फैल जाता हूं मैं आसमां में कुछ देर के लिए।
वहीं से देखता हूं, निहारता हूं,
कुछ देर ही सही मैं जुड जाता हूं,
मैं अपने घर गांव, रिश्‍ते नाते सभी से।
जब भी मैं यहां सूरज को देखता हूं,
फेफडों में भरता हूं सूरज की रोशनी,
ताकि खून में महसूस कर सकूं
रिश्‍तों की गर्मी।
शायद इसीलिए मैं आज भी,
जब भी मुझे किसी की याद आती है
अकसर पहुंच जाता हूं सांझ के सूरज को देखने....।

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