Thursday, 3 November 2011

मेरी धूप

मैं जब भी सुबह उठता हूं,
धूप अकसर मेरे कंधे पर आकर बैठ जाती है।
अलसाई आंखों के बीच,
वह मां जैसी गुनगुनाती है
:उठो लाल अब आंखें खेलो:।
वह अकसर मेरे साथ,
खेला करती थी मेरे आंगन में।
अकसर मैं बचपन में,
उसको अपनी मुटिठयों में पाता था।
वह मुझसे लिपट जाया करती थी।
आंख मिचौली करती थी।
सुबह से शाम तक हर दम
साथ घूमा करती थी।
कई बार दोपहरी में,
अकसर परेशान करती थी।
मेरी छाया को मुझसे ही दूर कर देती थी।
जितना ही पकडने की कोशिश करता,
और भी दूर भागती थी।
फिर अकसर शाम को,
वह अपने साथ ले जाती थी,
मेरी छाया को भी ।
रात को सोचता था,
धूप क्‍या कल भी आएगी मेरे आंगन में।
खिडकी से झांकेगी,
थपकी देगी और जगाएगी।
आज मुझे कोई नहीं जगाता,
धूप भी नहीं झांकती,
अब तो बस उसकी उमस ही बची हैं
कमरे में।
और मैं बेचैन होकर तडपता हूं
बचनप की उसी धूप से मिलने के लिए,
फिर से वही लोरी सुनने के लिए....
शायद अब कभी नहीं,
धूप नाराज है मुझसे.....।

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