Saturday, 7 July 2012

मौसम का इंतजार


मैं दरकता दरख्‍त हूं...
मेरी शाखों पर आज भी...
गुनगुनाती है धूप...
पतझड मेरी ही टहनियों पर...
इठलाती है...गाती है '
मेरे कंधों पर आज भी...
बादल खेलते हैं...
दूर कहीं बारिश होती है,,,
मैं भीग जाता हूं....
मैं सहमा सहमा सा...
आंधी का इंतजार करता हूं...
जाने कब मेरी शाखों पर...
कोपलें कांपेंगी...
सवेरा होने को है....
रात ढलने को है...
तारे सूरज में बदलने को तैयार हैं...
मुझे तो सिर्फ मौसम के....
बदलने का इंतजार है...

Tuesday, 8 November 2011

मार दिए जाओगे....

मत देखो सपने,
वरना मार दिए जाओगे....
समय की कोख में ही...
होगी तुम्‍हारी दिन दहाडे हत्‍या....
कुछ भी अलग करने की कोशिशें मत करो...
वरना...
दुनिया से ही अलग..थलग पड जाओगे।
कौन सुनेगा तुम्‍हारी दमघोंटू सि‍सकियां...
किसको वेधेंगी तुम्‍हारी कराहें...
वह भी तब कि जब...
यहां हर चीज बिकती है....
यहां तक कि तुम्‍हारी वेदनाएं भी।
सोचो...कौन रोएगा तुम्‍हारी मौत पर...
अब लोगों की आंखों से आंसू नहीं आते...
इसीलिए कहता हूं...
मत देखो सपने...
वरना सरेआम मार दिए जाओगे।
और वैसे भी तुम्‍हे सपने देखने का हक नहीं है...
क्‍योकि तुम हो आम आदमी...
और आम आदमी के पास सपना नहीं...
पेट होना चाहिए....

Thursday, 3 November 2011

मेरी धूप

मैं जब भी सुबह उठता हूं,
धूप अकसर मेरे कंधे पर आकर बैठ जाती है।
अलसाई आंखों के बीच,
वह मां जैसी गुनगुनाती है
:उठो लाल अब आंखें खेलो:।
वह अकसर मेरे साथ,
खेला करती थी मेरे आंगन में।
अकसर मैं बचपन में,
उसको अपनी मुटिठयों में पाता था।
वह मुझसे लिपट जाया करती थी।
आंख मिचौली करती थी।
सुबह से शाम तक हर दम
साथ घूमा करती थी।
कई बार दोपहरी में,
अकसर परेशान करती थी।
मेरी छाया को मुझसे ही दूर कर देती थी।
जितना ही पकडने की कोशिश करता,
और भी दूर भागती थी।
फिर अकसर शाम को,
वह अपने साथ ले जाती थी,
मेरी छाया को भी ।
रात को सोचता था,
धूप क्‍या कल भी आएगी मेरे आंगन में।
खिडकी से झांकेगी,
थपकी देगी और जगाएगी।
आज मुझे कोई नहीं जगाता,
धूप भी नहीं झांकती,
अब तो बस उसकी उमस ही बची हैं
कमरे में।
और मैं बेचैन होकर तडपता हूं
बचनप की उसी धूप से मिलने के लिए,
फिर से वही लोरी सुनने के लिए....
शायद अब कभी नहीं,
धूप नाराज है मुझसे.....।

सांझ का सूरज

जब भी मैं सांझ का सूरज देखता हूं,
मुझे अकसर अपने गांव वाले घर,
आंगन से उठते हुए चूल्‍हे का धुआं,
याद आता है।
जब भी मैं सांझ के सूरज को देखता हूं,
अकसर मुझे खेतों में पकी हुई
सुनहली बालियां याद आती हैं गेहूं की।
जब भी देखता हूं सांझ के सूरज को,
अकसर मुझे अपने घरौंदों में लौटते
पंक्षियों की चहचहाने और
बच्‍चों की किलकारियों की याद गूंज जाती है।
जब भी मैं सांझ के सूरज को देखता हूं,
अकसर मेरी आंखों के आगे तैर जाते हैं,
दादा-दादी, नानी-नाना, अम्‍मा-बाबूजी और न जाने कितने रिश्‍ते....।
आज जब कि मैं हूं
शहरों में फैले कंकरीटों के जंगल में,
सूरज नहीं दिखायी देता यहां,
न ही याद आते हैं मुझे वो रिश्‍ते।
इन पत्‍थरों की तरह हो चुका हूं,
मैं भी एक बेजान पत्‍थर।
जब भी कभी निकलना चाहा,
इन पत्‍थरों के झुरमुटों से,
और भी जकड लेती हैं मुझे ये उंची इमारतें।
फ‍िर भी मैं अकसर इनसे आजाद होकर,
पहुंच ही जाता हूं फ़लैट के छत पर।
सांझ के सूरज को देखने, बाहें पसारे,
फैल जाता हूं मैं आसमां में कुछ देर के लिए।
वहीं से देखता हूं, निहारता हूं,
कुछ देर ही सही मैं जुड जाता हूं,
मैं अपने घर गांव, रिश्‍ते नाते सभी से।
जब भी मैं यहां सूरज को देखता हूं,
फेफडों में भरता हूं सूरज की रोशनी,
ताकि खून में महसूस कर सकूं
रिश्‍तों की गर्मी।
शायद इसीलिए मैं आज भी,
जब भी मुझे किसी की याद आती है
अकसर पहुंच जाता हूं सांझ के सूरज को देखने....।

उगते सूरज के देश में अंधेरा

मैं जब भी रात को सोने की कोशिश करता हूं,
मुझे रात के सन्‍नाटे में जापान का जलजला,
 दहाडता हुआ नजर आता है।
उगते सूरज के देश में,
अब अंधेरा ही अंधेरा नजर आता है।
या शायद----
lसुनामी में डूबा सूरज नजर आता है।
.हर तरफ मौत की बाहें पसारे,
सुनामी की लहरें।
और लहरों पर बिखरे हुए सपने,
बिछुडे हुए रिश्‍ते,
बनाई हुईं बुनियादें
नजर आती हैं।
बडी बेबस और बेरहम
नजर आती जिंदगी,
कागज की तरह बहती हुई,
यहां वहां भीगी भीगी सी नजर आती है।
भूकंप से हिलती इमारतों के बीच,
बदहवास सी जिंदगी,
सहमी सहमी सी बेजार नजर आती है।
अंधेरे में फंसे बच्‍चे, बूढे, औरतें सभी
तलाशते हैं एक और दुनिया शायद अंधेरे में ही-----
न मालूम कैसी कैसी है ये दुनिया।
सपनों के टूटने,
 अपनों से बिछडने की दुनिया।
सुनामी में बहे आंसूओं से उबलती लहरें,
हर दरख्‍त पर निशान है,
एक विनाशकारी दुनिया का।
एक और हिरोशिमा, नागासाकी की,
सुगबुगाहट , बुदबुदाहट तो नहीं।
 ये अंत नहीं----
कहीं एक नई दुनिया की शुरुआत तो नहीं----।
रात के अंधेरे में सपने में,
अकसर मुझे जापान का जलजला याद आता है।
ऐसे में मैं फिर से नई दुनिया तलाशता हूं।
 जब भी रात को सोने की कोशिश करता हूं,
मुझे रात के सन्‍नाटे में जापान का जलजला,
 दहाडता हुआ नजर आता है।
उगते सूरज के देश में,
अब अंधेरा ही अंधेरा नजर आता है।
शायद-------नए सूरज के निकलने तक । 

Monday, 31 October 2011

सत्‍य का वजूद

बहुत बेबस हो जाता हूं मैं,
जब देखता हूं अपनी खुली आंखों से,
सत्‍य को मरते हुए,
कुचलते हुए।
कराहते हुए सत्‍य की टीस,
धंस जाती है सीने में।
जानता हूं कि सत्‍य,
कभी मरता नहीं,
अपने वजूद की भीख नहीं मांगता।
फिर भी विकलांग सत्‍य को,
लडखडाते हुए देखना,
और भी मायूस करता है मुझे।
जानता हूं कि सत्‍य की चोट,
बडी ही गहरी होती है।
फिर भी....।
सपने को सत्‍य में तब्‍दील होते,
देखना चाहता हूं।
जानता हूं कि सत्‍य खतरनाक,
होता है....।
फिर भी...
असत्‍य को सत्‍य में तब्‍दील होते देखना,
अपने सपनों को मरते हुए देखने जैसा ही है...।
बहुत बेबस हो जाता हूं,
जब सत्‍य की पहचान करना,
मुश्‍क‍िल हो जाता है।
खैर मैंने भी अब,
सत्‍य को कमरे की खूंटी पर,
टांग दिया है...।
असत्‍य का तमगा माथे पर,
बांध लिया है।
जानता हूं कि सत्‍य की चोट,
गहरी होती है,
पर सपनों को जिंदा रखने की तरकीब,
ढूढ ही लिया है।
अब मुझे सत्‍य के चीखने, चिल्‍लाने पर,
अफसोस नहीं होता.,
बस कराहते सत्‍य को,
अनुसना करके आगे बढ जाता हूं।
रात को चादर ओढकर,
चुपचाप सो जाता हूं...।
जानता  हूं कि अब हर सत्‍य,
मेरे लिए एक मामूली घटना,
बनकर रह जाती है।
हाशिए पर खडी एक खबर,
बनकर रह जाती है....।
बस  कभी कभार,
एक टीस बनकर
सत्‍य मुझे कुरेदता है....,।
शायद मेरे वजूद के ,
कहीं जिंदा होने की,
यह सत्‍य की आहट तो नहीं.......।

शायद हम जिंदा हैं...

मैं देखता हूं रोज,
एक खबर को,
जो चबाती है इंसानी दिमाग को
बडे निर्मम और निष्‍ठुर तरीके से,
हर तरफ एक वेश्‍या की तरह,
अपने बिकने के इंतजार में,
सजी संवरी सी नजर आती है खबर,
हमेशा अपना रंग बदलने को तैयार,
बेचैन सी रहती है खबर।
हर तरफ एक आहट,
एक सुगबुगाहट,
कुछ बुदबुदाहट को,
सूंघती रहती है खबर।
इंसान को जिंदा लाश बनने को,
मजबूर करती है खबर।
हम अकसर गलतफहमी में जीते हैं,
हम जिंदा हैं.....
......और मरती रहती है खबर।